'भोंसला' की चढ़ाई अंग प्रांत में बराबर होती थी और सर्वसाधारण को अपनी रक्षा के लिए भागने का स्थान खोजना पड़ता था, जिससे इसका नाम भागलपुर पड़ा! ऐसे ही कई कहानियों और मिथकों से भागलपुर के नाम को स्थापित करने का प्रयास तो किया गया है लेकिन 'भागलपुर' नाम की सृष्टि कब और कैसे हुई, इस तथ्य को इतिहास के पन्नों में स्थापित नहीं किया जा सका है।
'भागलपुर दर्पण' में झारखंडी झा ने भी सुनी-सुनाई बातों से भागलपुर के नाम को स्थापित करने का प्रयास किया है। इस पुस्तक के अनुसार मुसलमानी राज्य के समय भागे हुए कैदियों को यहां सख्त सजा दी जाती थी, इस कारण भागलपुर नाम पड़ा। दूसरा तथ्य, वृद्ध सज्जन लोग यह कहते हैं कि डाकुओं के उपद्रव से लोग भागकर तथा यहां से गंगा पार जाकर अपनी जान बचाते थे। एक अन्य तथ्य प्राचीन काल में भगलू नामक प्रख्यात पुरूष का संबंध भी इस नगर से था और कालांतर में इसका नाम इनसे जुड़कर भागलपुर पड़ गया।
ईस्ट इंडिया कंपनी के पुराने कागज पत्रों में इसका नाम 'वोगलीपुर' मिलता है। जो भी हो इतना तो तय है कि आज का भागलपुर प्राचीन अंग की राजधानी और सम्प्रति उसके मुख्य नगर का प्रतिनिधित्व करता है। गंगा और चम्पा के संगम पर बसी 'चम्पा' अंग की राजधानी थी। 'अंग और अंगिका' नामक आलेख में डा.माहेश्वरी सिंह महेश लिखते हैं-'आज चंपा ही नहीं, अंग भी भागलपुर है।'
अंग का नाम सर्वप्रथम अथर्ववेद में मिलता है। टामस वाटर का यान-चांग की भारत यात्रा के माध्यम से हुवेनसंग अंग नगरी के पौराणिक होने की पुष्टि करते हैं। इसमें वर्णित कथा के मुताबिक, मनुष्य गृहहीन जंगली थे। एक अप्सरा स्वर्ग से आई। उसने गंगा में स्नान किया और गर्भवती हो गई। उसके चार पुत्र हुए, जिन्होंने संसार को चार भागों में विभाजित कर अपनी-अपनी नगरी बसाई। प्रथम नगरी का नाम चंपा था..।' वाल्मिकी रामायण (1/23/14-56)के अनुसार मदन(कामदेव) शिव के आश्रम से शिव के क्रोध से भस्मीभूत होने के डर से भागा और उसने जहां अपने शरीर का त्याग किया, उसे अंग कहा जाने लगा। महाभारत और पुराणों के अनुसार बली के क्षेत्रज पुत्रों ने अपने नाम से राज्य बसाया था। चंद्रवंशी ययाति के पौत्र तितिक्षु ने प्राच्य में आण्व राज्य की स्थापना की।
मालिनी, चम्पा, चंपापुरी, लोम्पादुपू और कर्णपू आदि कई नाम आज के भागलपुर के निकटस्थ चंपा के अतीत में रह चुके हैं। अंग की राजधानी चंपा थी। चंपा की नींव राजा चंप ने कलि संवत 1061 में डाली, इसका प्राचीन नाम मालिनी था। राजा चंप महान पराक्रमी राजा लोमपाद के प्रपौत्र थे। एक कथा के अनुसार राजा लोमपाद महान धनुर्धर थे और अपने समकालीन अयोध्या के राजा दशरथ के परम मित्र थे। परंतु राजा लोमपाद संतानहीन थे। अस्तु उन्होंने अपने अभिन्न मित्र राजा दशरथ की पुत्री शांता को गोद लिया। इसी शांता का विवाह ऋषि ऋंगि से हुआ। ऋषि ऋंगि ने लोमपाद के लिए पुत्र कामेष्टि यज्ञ किया, जिससे लोमपाद को चतुरंग या तरंग नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। चतुरंग या तरंग को पृथुलाक्ष नामक पुत्र उत्पन्न हुआ और पृथुलाक्ष के पुत्र हुए चम्प, जिन्होंने चंपा नगरी बसाई।
चंप के वंश में ही आगे चलकर राजा अधिरथ हुए। राजा अधिरथ ने ही कुमारी कुन्ती द्वारा गंगा में प्रवाहित कर्ण का पालन-पोषण किया और बाद में कुरुराज से अपनी मित्रता को कायम रखकर उसका अभूतपूर्व आदर्श विश्व में उपस्थित किया। इसका अवशेष भागलपुर के पश्चिम चंपानगर या कर्णगढ़ में आज भी वर्त्तमान है। गंगा तट पर बसने के कारण यह नगर वाणिज्य का केन्द्र हो गया और बुद्ध की मृत्यु के समय यह भारत के छह प्रमुख नगरों में से एक था। इस नगर का ऐश्वर्य बढ़ता गया और यहां के व्यापारी सुवर्णभूमि तक इस बन्दरगाह की नावों पर जाते थे। इस नगर के वासियों ने हिंद-चीन प्रायद्वीप में अपने नाम का एक उपनिवेश बसाया।
पालवंश के उदय के साथ विक्रमशिला में बौद्ध विश्वविद्यालय की स्थापना हुई, तब अंग का गौरव एक बार पुन: जाग उठा। इस बार का गौरव शिक्षा, संस्कृति और सभ्यता का था। यही समय था, जब चीन तक अंग की ख्याति फैल गई थी। राहुल सांस्कृत्यायन ने अपने तिब्बत में सवा बरस के पृष्ट संख्या 18 में लिखा है मुगल काल में शोषण और उत्पीड़न के उस काल में भी अंग का महत्व कम नहीं हुआ। शाहजहां के पुत्र शाहशुजा को भागलपुर इतना प्यारा लगा कि उसने शुजागंज या शुजानगर ही बसा दिया। आज सूजागंज भागलपुर शहर का मुख्य व्यापारिक केन्द्र है।
जैनियों के बारहवें तीर्थकर भगवान वसूपूज्य ने यहीं जन्म लिया, ज्ञान प्राप्त किया और निर्वाण को प्राप्त हुए। इस भूमि को चौबीसवें तीर्थकर जैन महावीर की प्रथम शिष्या चंदन बाला की जन्मभूमि होने का गौरव प्राप्त है। जैन धर्मावलंबी इसे चंपापुरी के नाम से पुकारते हैं। बौद्धकाल में चंपा उत्तर भारत के महा जनपदों में एक थी। भगवान बुद्ध के मौदगल्य जैसे शिष्य तथा विशाखा जैसी शिष्या यहीं की धूली में लोटकर बड़े हुए। चक्रवर्ती सम्राट अशोक की मां सुभद्रांगी का जन्म यहीं इस चंपा के एक गरीब ब्राह्माण परिवार में हुआ था। चांद सौदागर के पुत्र बाला लखेन्द्र और पुत्रबधु महासती बिहुला की कथा इसी माटी की उपज है। आज भी चंपानगर विषहरी पूजा का केन्द्र स्थल है। यह इस अंगभूमि का दुर्भाग्य ही है कि इसकी गौरवशाली अतीत आज उपेक्षित होकर विस्मृति के गर्भ में समाता चला जा रहा है। डा. एसएम राफिक 'ज़मां' के अनुसार-'भागलपुर न केवल रूहानियत का शहर बल्कि अध्यात्म का नगर भी है। इसके चप्पे-चप्पे पर खुदा के नेक बंदे आराम फरमा रहे हैं, जिन्हें दुनिया सूफी, बुजुर्ग, औलिया ए किराम, दुर्वेश, फकीर, पीर इत्यादि नामों से पुकारती है। यही वे पवित्र हस्तियां हैं, जिन्होंने प्यार का पैगाम फैलाया। भागलपुर की खुशनसीबी है कि इसके लगभग सभी मुहल्लों में वलियों, दर्वेशों, फकीरों के आशियाने दिखाई देते हैं। भागलपुर की यह विशेषता है कि इसके अधिकतर मुहल्लों के नाम ऐसी ही पाक हस्तियों के नाम पर रखे गए हैं, जो आज से नहीं सदियों से सरकारी रिकार्ड में अंकित है।'
अंग्रेजी शासन काल में भागलपुर शोषण और दोहन के बाद के बाद भी विदेशी शासन के विरुद्ध लोहा लेता रहा।
Friday, March 12, 2010
Wednesday, October 28, 2009
जीते क्या व आंसू पीते हैं गरीब
रघु, तुमने सुबह से कुछ नहीं खाया है। ये ले एक रुपया। बिस्किट खा लेना, छोटे को टाफी खरीदवा देना और हां, सुन! आठ आने वापस भी ले आना। रघु की दीदी जब रघु से यह बात कहती है तो दीपप्रभा टाकीज में फिल्म देख रहे बच्चे गरीबी के इस आलम को देख सिहर उठते हैं। हाल में मौजूद सातवीं कक्षा का मनोज तपाक से कह बैठता है, आठ आने में पूरी दुकान खरीदवानी है क्या! 'कारामाती कोट' फिल्म का नाम सुनते ही लगता है कि यह जादुई दुनिया के सुनहरे सपनों पर आधारित है, परंतु वास्तव में कहानी स्लम एरिया की भीषण गरीबी को चित्रित करती है। जब रघु स्कूल जाने की बात कहता है तो उसके जीजा उसे बरसात की सर्द रात में पीट कर घर से निकाल देते हैं। एक दुकान के बाहर सोए रघु को नीले बालों वाली बुढि़या एक लाल रंग कोट ओढ़ा देती है और बाद में रघु जानता है कि इस कोट की जेब से वह जितने चाहे, एक रुपये के सिक्के निकाल सकता है। रुपयों के ढेर को देख कर रघु की खुशी में फिल्म देखने आए बच्चे भी शरीक हो जाना चाहते हैं, सो जम कर तालियां पीटते हैं। जब फिल्म की कहानी में बूट पालिश कर रहे रघु के दो दोस्तों और फूलों के गजरे बनाकर बेचने वाली छोटी सी बच्ची की दरिद्रता सामने आती है तो छठी कक्षा में पढ़ने वाली मंजरी स्कूल की तरफ से मिले बिस्किट के पैकेट को समेट कर अपने हाथ में रख लेती है, मानो वह ही उन गरीब बच्चों के हिस्से का बिस्किट खा रही हो। इन बच्चों को जब पहली बार नहाने का साबुन मिलता है तो इनकी खुशी को बयान कर पाना असंभव हो जाता है। एक ओर जहां रघु का जीजा उसे काम पर लगाना चाहता है, वहीं रघु आगे पढ़ाई करना चाहता है। जब रघु खुशबू वाला इरेजर लेकर स्कूल जाता है तो स्लम एरिया के गरीब बच्चे उसे सिर्फ एक बार सूंघने देने की खुशामद करते हैं। आगे कहानी के साथ बच्चों की खुसुर-फुसुर भी चालू हो जाती है। जब मालगाड़ी के खराब डिब्बे में रहने देने के लिए चौकीदार रघु से पचास रुपये वसूलता है तो बच्चे इस भ्रष्टाचार को सहन न कर पुलिस-प्रशासन के खिलाफ कई कड़े जुमले उछाल ही देते हैं। अंत में इसी कोट के कारण उसके जीजा और गुंडे उसके साथ जानवरों जैसा सलूक करते हैं और इन सब से आजिज आकर रघु उस कोट को समुद्र में फेंक देता है। फिल्म की कहानी चाहे जो भी हो पर बच्चों ने कहा कि उन्हें इस फिल्म से लालच से बचने की प्रेरणा मिली है। कुछ शिक्षक इस बात पर आक्रोशित दिखे कि पूरी फिल्म एक नकारात्मक संदेश छोड़ती है। फिल्म से मिलने वाले संदेश को लेकर जब बच्चों से बात की गई तो कक्षा आठ की रितु, कक्षा छह की शिवानी, कक्षा सात की आशा और कक्षा आठ की मीनू ने कहा कि हमें जीवन में कभी लालच नहीं करना चाहिए। वहीं कक्षा छह के मो. नदीम और जफर ने बताया कि यदि आप अच्छा काम करते हों तो ऊपर वाला भी आपका भला करेगा। पांचवीं कक्षा के ओंकार कुमार सिन्हा के अनुसार हमें हमेशा भलाई की ओर अग्रसर रहना चाहिए। सातवीं कक्षा की अफसाना परवीन, रुकसार और छठी कक्षा की चांदनी का कहना था कि फिल्म ने उन्हें भलाई करने की सीख दी है।
ओवरलोडिंग पर नहीं चल रहा कानून का डंडा
भागलपुर। आदमी को जानवर की तरह बस में बिठाने का नजारा सुल्तानंगज - देवघर मार्ग पर ही नहीं अमूनन यह नजारा बिहार की उन हर सड़कों पर देखने को मिलती है जिस होकर बड़े वाहनों का परिचालन होता है। मंगलवार को सुल्तानगंज - देवघर मार्ग के बछौर गांव के समीप हुई बस दुर्घटना में घायलों की तायदाद इतनी नहीं होती अगर वाहन पर निर्धारित क्षमता के अनुरूप यात्रियों को बिठाया जाता । दरअसल पैसे के लालच में वाहन चालक व खलासी यात्रियों को बस की सीट के अलावा बस के अंदर व छत पर ठूस देते हैं। हाल ही में परिवहन विभाग की ओर से एक निर्देश दिया गया थी वाहनों पर ओवरलोडिंग करने वाले बस मालिकों के साथ - साथ छत पर सवारी करने वाले यात्रियों से भी जुर्माना भी वसूला जाएगा । लेकिन इन आदेश धरातल पर नहीं उतर पाए । अधिकांश बस चालक स्टैंड किरानी के साथ मिलकर यात्रियों की जान को जोखिम में डाल सफर को संकट में डाल रहे हैं। मायागंज अस्पताल में भर्ती कई घायल बस के अंदर खड़े थे। घायलों ने बताया कि बस की निर्धारित सीट 52 थी । लेकिन बस पर करीब सौ से अधिक यात्रियों को ऊपर नीचे बिठाया गया था। पुलिस का कहना है कि ओवरलोडिंग रोकने का काम परिवहन विभाग का है। लेकिन परिवहन विभाग अपनी जिम्मेवारी का सही निर्वहन नहीं कर रहा है। सुल्तानगंज से देवघर के लिए हर दिन सुल्तानगंज बस डिपो से दर्जन से अधिक बड़ी बस खुलती है। सवारियों को बिठाने की होड़ में यात्रियों की जिंदगी का जरा भी ख्याल नहीं रखा जाता है। अगर कोई यात्री नियम कानून का हवाला देता है तो उसे या तो चालक - सह चालक से पंगेबाजी मोल लेनी पड़ती या फिर बस से उतरना पड़ता है। ऐसे में यात्री अपनी यात्रा को मंगलमय बनाने के लिए बस चालकों का जुल्म मौन रखकर बर्दाश्त करने में ही अपनी भलाई समझते है। सड़क पर हो रहे हादसों की मुख्य वजह ओवरलोडिंग भी है। वाहन मालिकों की दबंगई की आड़ में ओवरलोडिंग के बने कानून धूल फांक रहे हैं। पुलिस - प्रशासन व परिवहन विभाग सभी एक दूसरे पर दोषारोपण कर अपनी जिम्मेवारियों से बच रहे हैं और हादसों पर हादसा हो रहा है। सब कुछ जानकार भी शासन - प्रशासन मौन व खामोश है।
Saturday, October 24, 2009
GI status sought for Bhagalpur silk fabrics and sarees
A group of organisations have sought Geographical Indication (GI) status for silk fabrics and sarees produced in Bhagalpur division of Bihar.
The Bhagalpur Regional Handloom Weavers Cooperative Union and six other organisations have filed an application before the Chennai-based Geographical Indication Registry, the competent authority under Government of India, for a GI tag for 'Bhagalpur Silk Fabrics and Sarees'.
The Geographical Indication is a sign used on goods that have a specific geographical origin and possess qualities, reputation or characteristics that are essentially attributable to that region.Once granted, the GI status would legally prohibit others to sell sarees and fabrics made at places other than Bhagalpur under the same brand.The GI tag for fabrics and sarees can become an effective tool for economic empowerment of the weaver community.The Bhagalpur Regional Handloom Weavers Cooperative Union and six other organisations have filed an application before the Chennai-based Geographical Indication Registry, the competent authority under Government of India, for a GI tag for 'Bhagalpur Silk Fabrics and Sarees'.
The Geographical Indication is a sign used on goods that have a specific geographical origin and possess qualities, reputation or characteristics that are essentially attributable to that region.Once granted, the GI status would legally prohibit others to sell sarees and fabrics made at places other than Bhagalpur under the same brand.The GI tag for fabrics and sarees can become an effective tool for economic empowerment of the weaver community.
The Bhagalpur Regional Handloom Weavers Cooperative Union and six other organisations have filed an application before the Chennai-based Geographical Indication Registry, the competent authority under Government of India, for a GI tag for 'Bhagalpur Silk Fabrics and Sarees'.
The Geographical Indication is a sign used on goods that have a specific geographical origin and possess qualities, reputation or characteristics that are essentially attributable to that region.Once granted, the GI status would legally prohibit others to sell sarees and fabrics made at places other than Bhagalpur under the same brand.The GI tag for fabrics and sarees can become an effective tool for economic empowerment of the weaver community.The Bhagalpur Regional Handloom Weavers Cooperative Union and six other organisations have filed an application before the Chennai-based Geographical Indication Registry, the competent authority under Government of India, for a GI tag for 'Bhagalpur Silk Fabrics and Sarees'.
The Geographical Indication is a sign used on goods that have a specific geographical origin and possess qualities, reputation or characteristics that are essentially attributable to that region.Once granted, the GI status would legally prohibit others to sell sarees and fabrics made at places other than Bhagalpur under the same brand.The GI tag for fabrics and sarees can become an effective tool for economic empowerment of the weaver community.
Monday, October 12, 2009
US scientists to map Ganga stretch between Kahalgaon and Patna
Scientists from the United States would work with the researchers of Tilka Manjhi Bhagalpur University (TNBU) to analyse the quality of water of river Ganga and prepare a map of riverbed through Global Positioning System (GPS).
The Inland Waterways Authority of India will lend support to the effort with a well equipped vessel to aid the research, between October 21 and 31.
The Inland Waterways Authority of India will lend support to the effort with a well equipped vessel to aid the research, between October 21 and 31.
जहां चलती थी रेलगाड़ी वहां अब चलती है बैलगाड़ी
भागलपुर। जी हां प्रखंड के लत्तीपुर में अब रेलगाड़ी की जगह बैलगाड़ी ने ले ली है। डेढ़ दशक पूर्व बिहपुर रेलवे स्टेशन से भाया लत्तीपुर, शंकरपुर एवं महादेवपुर तक रेलगाड़ी चला करती थी। जहां से यात्री पानी जहाज का सफर तय कर भागलपुर पहुंचते थे। पर अब ऐसा नहीं है। यहां के लोग अब बैलगाड़ी से सफर करते हैं। लत्तीपुर के नंदु यादव बताते हैं कि तब अपरिहार्य कारणों से दो बार रेल का परिचालन बंद किया गया था मगर पुन: परिचालन बहाल कर दिया था। पर तीसरी बार रेलवे ने इसकी सुध नहीं ली और परिचालन पूरी तरह ठप हो गया। अब तो बिहपुर से अरसंडी तक रेल पटरी भी हटा लिया गया। इस कारण यहां का विकास पूरी तरह ठप हो गया। परबल, खीरा व मछली व्यवसाय के लिए विख्यात लत्तीपुर गांव आज अपने सुनहरे अतीत एवं उपेक्षित वर्तमान पर आंसू बहा रहा है। ग्रामीण बताते हैं कि सम्पन्न लोकसभा चुनाव से पूर्व बिहपुर रेलवे स्टेशन पहुंचे तत्कालीन रेलमंत्री लालू प्रसाद यादव ने इस रेलखंड का पुन: सर्वे कराकर रेल परिचालन बहाल करने की घोषणा की थी। पर चुनावी नतीजों के बाद घोषणा पर अमल नहीं किया जा सका। लत्तीपुर उत्तर के पूर्व मुखिया श्याम सुन्दर राय बताते हैं कि वर्तमान में यहां के लोग बैलगाड़ी से सफर कर अपना काम निपटाते हैं।
Wednesday, May 13, 2009
क्या ऐसा होता माडल स्टेशन?
भागलपुर। यात्रियों की संख्या में तो इजाफा हुआ ,लेकिन सुविधाओं में कोई बढ़ोत्तरी नहीं हुई। यही सच है नवगछिया स्टेशन का जिसे रेलवे ने माडल स्टेशन के रूप में विकसित करने का निर्णय लिया है। रेलवे लाइन के दोहरीकरण के बाद यहां तीन ट्रैक जरूर हो गए लेकिन प्लेटफार्म दो पर शेड के अभाव में यात्री धूप व बरसात में तपने व भींगने को मजबूर हैं। प्लेटफार्म दो पर एक शेड बना जरूर है लेकिन वह इतना छोटा है कि यात्रियों को कोई भी राहत नहीं मिलती है। प्लेटफार्म एक से दो नंबर व बस पड़ाव जाने के लिए एकमात्र पैदल ओवर ब्रिज पर हल्की बरसात के बाद जलजमाव के कारण यात्रियों को बेहद दिक्कतों के बीच आवागमन करना पड़ता है। वार्ड पार्षद पवन पासवान का कहना है कि स्टेशन रोड की भी स्थिति जर्जर है। सड़क की सुधि लेने वाला तक कोई नहीं है। दो साल पहले बाढ़ में ध्वस्त इस सड़क का निर्माण विभागीय कागजों में धूल फांक रहा है। पुस्तक विक्रेता अनिरूद्ध सिंह का कहना है कि केवल नाम का माडल स्टेशन है। आए दिन स्टेशन परिसर शाम होते ही अंधेरे में गुम हो जाता है। सड़क बरसात में कीचड़ से इस कदर सन जाती है कि जरा सी असावधानी होने पर गिरना तय है। मंगलवार को बरसात के बाद ओवर ब्रिज पर चढ़ने वाला स्थान जलजमाव से भर गया है। पूरे मामले में इंजीनियरिंग विभाग के सहायक ने बताया कि जलजमाव की समस्या से निजात दिलाने के लिए वरीय अधिकारियों को प्रस्ताव भेजा जा रहा है। साथ ही प्लेटफार्म दो पर शेड बनाने का कार्य चल रहा है।
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