Thursday, June 24, 2010
परिधि के उदय कहते हैं कि प्रेक्षागृह नहीं होने से नई प्रतिभाएं सामने नहीं आ पाती। वे कहते हैं कि इस समस्या पर सब सरकार को कोसते हैं। लेकिन हमारा समाज भी इस मुद्दे पर कम दोषी नहीं है। एक कलाकार अपनी प्रस्तुति से संस्कृति और सभ्यता का बोध कराता है। जब हम कलाकारों की ही उपेक्षा करेंगे तो अपनी संस्कृति खुद ही नजरअंदाज हो जाएगी। महाराष्ट्र, बंगाल में कलाकारों को उचित सम्मान व पूरा मौका मिलता है। लेकिन यहां ऐसा सोचना भी गलत है।
'दिशा' के चन्द्रेश कहते हैं कि यह समस्या आज की नहीं बल्कि कई वर्षो पुरानी है। उन्होंने बताया कि इस मुद्दे पर हम लोग करीब 12 वर्षो से संघर्षरत हैं। जनप्रतिनिधियों द्वारा कभी ध्यान नहीं देने पर चन्द्रेश कहते हैं कि सुशील मोदी, अश्रि्वनी चौबे व सैय्यद शाहनवाज हुसैन से प्रेक्षागृह बनवाने की मांग की गई। लेकिन आश्वासन के सिवा कुछ नहीं मिला।
रंगकर्मी प्रवीर कहते हैं कि भागलपुर में होने वाली सांस्कृतिक गतिविधियों की तुलना में प्रेक्षागृहों की कमी काफी कम है। जिसका सीधा प्रभाव कलाकारों पर पड़ा है। वे प्रश्न दागते हैं कि आखिर कब तक एक कलाकार साधनहीनता से संघर्ष करता रहेगा। बगुला मंच के रामावतार राही तो इस मसले पर काफी तल्ख दिखते हैं। वे कहते हैं कि सरकार ने आज तक हम लोगों को दिया ही क्या है। उन्होंने कहा कि इससे बड़ी त्रासदी और क्या होगी कि साहित्यकारों को किसी की जयंती मनाने के लिए भी किराए पर भवन लेना पड़ता है।
स्वाभिमानी बनें
Friday, March 19, 2010
विक्रमशिला का होगा उद्धार
शुरूआती दौर में तीन ऐतिहासिक स्थलों को चुनकर कार्य शुरू करने की योजनाओं का सार्थक परिणाम आने तक अन्य पुरातात्विक धरोहरों का चयन कर कार्यक्रम का विस्तार किया जाएगा। कहलगांव स्थित विक्रमशिला महाविहार को गोद लेने की संभावना के विषय में पूछने पर उन्होंने कहा कि संभावनाएं अनंत हैं और विक्रमशिला विवि के ऐतिहासिक महत्व को देखते हुए इसे प्राथमिकता सूची में अवश्य ही स्थान दिया जाएगा। प्रयोग के तौर पर कार्यारंभ करने और उसके फलाफल पर योजना का भविष्य निर्भर है।
Tuesday, March 16, 2010
उत्तर बिहार का हब बनेगा भागलपुर
भागलपुर के विकास के लिए इस पुल का निर्माण जरूरी है। राजनीतिक कारणों से इसे उपेक्षित कर दिया गया है। जमालपुर सुरंग की हालत भी खराब हो चुकी है। इसका विकल्प रेलवे को तलाशना चाहिए। अगर समय रहते रेलवे द्वारा सुरक्षात्मक उपाय नहीं ढूंढा गया तो कोई बड़ी दुर्घटना घट सकती है।
Monday, March 15, 2010
विक्रमशिला व बटेश्वर के दृश्य से बढ़ी महोत्सव की भव्यता
Sunday, March 14, 2010
फिर से ज्ञान का केन्द्र बनेगा बिहार
शनिवार को विक्रमशिला बौद्ध महाविहार में दीप प्रज्जवलित कर मुख्यमंत्री ने विधिवत तीन दिवसीय विक्रमशिला महोत्सव का उद्घाटन किया। उद्घाटन के बाद समारोह को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि बिहार इतना आगे बढ़ेगा कि लोग दांतों तले ऊंगलियां दबाएंगे। फिलहाल राज्य का विकास दर 11 प्रतिशत है और इसे 15 प्रतिशत तक पहुंचा दिया जाएगा। उन्होंने 2015 तक बिहार को विकसित राज्य बनाने का संकल्प लिया है। मुख्यमंत्री ने कहा कि विक्रमशिला का गौरवशाली इतिहास रहा है। विक्रमशिला के बारे में लोगों को जो जानकारी है वह पूरी नहीं है। अभी पूरी तरह से इसकी खुदाई नहीं हुई है। खुदाई के बाद विक्रमशिला के बारे में और अधिक जानकारी मिल सकती है।
उन्होंने कहा कि विक्रमशिला में एक संबृद्ध संग्रहालय बनना चाहिए। साथ ही यहां पर्यटकों को अधिक से अधिक सुविधाएं मिले। इसके लिए कला संस्कृति विभाग द्वारा सारी तैयारी की जा रही है। इन सारे प्रस्तावों को भारत सरकार के पास रखा जाएगा। जमीन अधिग्रहित कर विक्रमशिला को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किए जाने की योजना है। मुख्यमंत्री ने कहा कि पहले बिहार में पर्यटक आना नहीं चाहते थे। अब हर साल चार लाख विदेशी और एक करोड़ देशी पर्यटक यहां आते हैं। राज्य की आर्थिक स्थिति तब मजबूत होगी जब यहां पर्यटक आएंगे और खर्च करेंगे। उन्होंने कहा कि ऐसा बिहार बनेगा जिससे 15 दिनों तक पर्यटक यहां खो जाएंगे।
Saturday, March 13, 2010
CESC to move Pirpainti power project closer to Bihar capital
While CESC had initially earmarked Pirpainti for its 2,000 MW power generation plant in the state, it has now decided to move the project closer to Patliputra after running into land acquisition problems. But it is yet to confirm the exact location for the proposed project.
“Since we are looking at the Patliputra (Patna) distribution circle, it makes sense to move the project closer to the city. The plant will definitely be somewhere in northern Bihar,” a spokesperson said.
The Kolkata-based company, in July last year, had unveiled its plan to set up a 2,000 MW power generation plant at Pirpainti by opening a new power company, Nalanda Power Company – a 100 percent subsidiary of CESC.
CESC has also applied for coal mining rights for sourcing the required coal for this coal-fired merchant thermal power unit, said vice-chairman of the company Sanjiv Goenka.
CESC intends on adding 5,000 MW of thermal generation capacity over the next few years, with investments in the range of Rs 20,000 crore, by establishing five new facilities across the country. Of these, it has already commenced work at the projects in Haldia (West Bengal) and Chandrapur (Maharashtra), while the other three thermal generation units each in Bihar, Jharkhand and Orissa will become operational only by 2013.
The company has been allotted captives mines in the Dumka, Jharkhand.
“Our group plans to add 5,000 MW of thermal generating capacity. We are looking at opportunities for inorganic growth as well. Thanks to our internal accruals, and room to tap both equity and debt options, funds are not a problem,” Goenka said on Thursday.
Friday, March 12, 2010
विक्रमशिला विश्वविद्यालय को लेकर सरकार गंभीर पहल नहीं कर रही
श्री मिश्र के मुताबिक, नालंदा विश्वविद्यालय में एक द्वार का पता चला है जबकि विक्रमशिला में छह द्वार थे। द्वार की संख्या छह होने का तात्पर्य है कि यहां पर छह विषयों की पढ़ाई होती थी जिनमें केवल तंत्र विद्या ही नहीं बल्कि फीजिक्स, केमिस्ट्री, क्रिएटिव रिलीजन, कल्चर आदि शामिल थे। विक्रमशिला विश्वविद्यालय में लगभग दस हजार विद्यार्थियों की पढ़ाई होती थी और उनके लिए करीब एक सौ आचार्य पढ़ाने का काम करते थे। गौतम बुद्ध स्वयं यहा आए थे और यही से गंगा नदी पार कर सहरसा की ओर गए थे।
श्री मिश्र के मुताबिक, ऐसा कोई प्रमाण सामने नहीं आया है कि नालंदा से कोई स्कालर यहां आकर पढ़ाने का शुरू किया। बेशक यहां से तिब्बत के राजा के अनुरोध पर दिपांकर अतीश तिब्बत गए और उन्होंने तिब्बत से बौद्ध भिक्षुओं को चीन, जापान, मलेशिया, थाइलैंड से लेकर अफगानिस्तान तक भेजकर बौद्ध धर्म का प्रचार-प्रसार किया। विक्रमशिला के बारे में सबसे पहले राहुल सांस्कृत्यायन ने सुल्तानगंज के करीब होने का अंदेशा प्रकट किया था। उसका मुख्य कारण था कि अंग्रेजों के जमाने में सुल्तानगंज के निकट एक गांव में बुद्ध की प्रतिमा मिली थी। बावजूद उसके अंग्रेजों ने विक्रमशिला के बारे में पता लगाने का प्रयास नहीं किया। इसके चलते विक्रमशिला की खुदाई पुरातत्व विभाग द्वारा 1986 के आसपास शुरू हुआ। खुदाई कार्यो की देखरेख में लगे बी.एस.वर्मा ने बहुत अधिक दिलचस्पी नहीं दिखाई और अधिकांश मूर्तियां यहां से उठाकर पटना ले गए और वहीं जमा कर दिए। आज तक उसकी रिपोर्ट यहां नहीं है। ऐसी स्थिति में वर्तमान सरकार द्वारा महोत्सव कराया जाना महज एक राजनीतिक प्रपंच है। इससे कोई दीर्घकालिक परिणाम निकलने वाला है।
स्वर्ण अक्षरों में अंकित है अंग का सम्बृद्ध इतिहास
'भागलपुर दर्पण' में झारखंडी झा ने भी सुनी-सुनाई बातों से भागलपुर के नाम को स्थापित करने का प्रयास किया है। इस पुस्तक के अनुसार मुसलमानी राज्य के समय भागे हुए कैदियों को यहां सख्त सजा दी जाती थी, इस कारण भागलपुर नाम पड़ा। दूसरा तथ्य, वृद्ध सज्जन लोग यह कहते हैं कि डाकुओं के उपद्रव से लोग भागकर तथा यहां से गंगा पार जाकर अपनी जान बचाते थे। एक अन्य तथ्य प्राचीन काल में भगलू नामक प्रख्यात पुरूष का संबंध भी इस नगर से था और कालांतर में इसका नाम इनसे जुड़कर भागलपुर पड़ गया।
ईस्ट इंडिया कंपनी के पुराने कागज पत्रों में इसका नाम 'वोगलीपुर' मिलता है। जो भी हो इतना तो तय है कि आज का भागलपुर प्राचीन अंग की राजधानी और सम्प्रति उसके मुख्य नगर का प्रतिनिधित्व करता है। गंगा और चम्पा के संगम पर बसी 'चम्पा' अंग की राजधानी थी। 'अंग और अंगिका' नामक आलेख में डा.माहेश्वरी सिंह महेश लिखते हैं-'आज चंपा ही नहीं, अंग भी भागलपुर है।'
अंग का नाम सर्वप्रथम अथर्ववेद में मिलता है। टामस वाटर का यान-चांग की भारत यात्रा के माध्यम से हुवेनसंग अंग नगरी के पौराणिक होने की पुष्टि करते हैं। इसमें वर्णित कथा के मुताबिक, मनुष्य गृहहीन जंगली थे। एक अप्सरा स्वर्ग से आई। उसने गंगा में स्नान किया और गर्भवती हो गई। उसके चार पुत्र हुए, जिन्होंने संसार को चार भागों में विभाजित कर अपनी-अपनी नगरी बसाई। प्रथम नगरी का नाम चंपा था..।' वाल्मिकी रामायण (1/23/14-56)के अनुसार मदन(कामदेव) शिव के आश्रम से शिव के क्रोध से भस्मीभूत होने के डर से भागा और उसने जहां अपने शरीर का त्याग किया, उसे अंग कहा जाने लगा। महाभारत और पुराणों के अनुसार बली के क्षेत्रज पुत्रों ने अपने नाम से राज्य बसाया था। चंद्रवंशी ययाति के पौत्र तितिक्षु ने प्राच्य में आण्व राज्य की स्थापना की।
मालिनी, चम्पा, चंपापुरी, लोम्पादुपू और कर्णपू आदि कई नाम आज के भागलपुर के निकटस्थ चंपा के अतीत में रह चुके हैं। अंग की राजधानी चंपा थी। चंपा की नींव राजा चंप ने कलि संवत 1061 में डाली, इसका प्राचीन नाम मालिनी था। राजा चंप महान पराक्रमी राजा लोमपाद के प्रपौत्र थे। एक कथा के अनुसार राजा लोमपाद महान धनुर्धर थे और अपने समकालीन अयोध्या के राजा दशरथ के परम मित्र थे। परंतु राजा लोमपाद संतानहीन थे। अस्तु उन्होंने अपने अभिन्न मित्र राजा दशरथ की पुत्री शांता को गोद लिया। इसी शांता का विवाह ऋषि ऋंगि से हुआ। ऋषि ऋंगि ने लोमपाद के लिए पुत्र कामेष्टि यज्ञ किया, जिससे लोमपाद को चतुरंग या तरंग नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। चतुरंग या तरंग को पृथुलाक्ष नामक पुत्र उत्पन्न हुआ और पृथुलाक्ष के पुत्र हुए चम्प, जिन्होंने चंपा नगरी बसाई।
चंप के वंश में ही आगे चलकर राजा अधिरथ हुए। राजा अधिरथ ने ही कुमारी कुन्ती द्वारा गंगा में प्रवाहित कर्ण का पालन-पोषण किया और बाद में कुरुराज से अपनी मित्रता को कायम रखकर उसका अभूतपूर्व आदर्श विश्व में उपस्थित किया। इसका अवशेष भागलपुर के पश्चिम चंपानगर या कर्णगढ़ में आज भी वर्त्तमान है। गंगा तट पर बसने के कारण यह नगर वाणिज्य का केन्द्र हो गया और बुद्ध की मृत्यु के समय यह भारत के छह प्रमुख नगरों में से एक था। इस नगर का ऐश्वर्य बढ़ता गया और यहां के व्यापारी सुवर्णभूमि तक इस बन्दरगाह की नावों पर जाते थे। इस नगर के वासियों ने हिंद-चीन प्रायद्वीप में अपने नाम का एक उपनिवेश बसाया।
पालवंश के उदय के साथ विक्रमशिला में बौद्ध विश्वविद्यालय की स्थापना हुई, तब अंग का गौरव एक बार पुन: जाग उठा। इस बार का गौरव शिक्षा, संस्कृति और सभ्यता का था। यही समय था, जब चीन तक अंग की ख्याति फैल गई थी। राहुल सांस्कृत्यायन ने अपने तिब्बत में सवा बरस के पृष्ट संख्या 18 में लिखा है मुगल काल में शोषण और उत्पीड़न के उस काल में भी अंग का महत्व कम नहीं हुआ। शाहजहां के पुत्र शाहशुजा को भागलपुर इतना प्यारा लगा कि उसने शुजागंज या शुजानगर ही बसा दिया। आज सूजागंज भागलपुर शहर का मुख्य व्यापारिक केन्द्र है।
जैनियों के बारहवें तीर्थकर भगवान वसूपूज्य ने यहीं जन्म लिया, ज्ञान प्राप्त किया और निर्वाण को प्राप्त हुए। इस भूमि को चौबीसवें तीर्थकर जैन महावीर की प्रथम शिष्या चंदन बाला की जन्मभूमि होने का गौरव प्राप्त है। जैन धर्मावलंबी इसे चंपापुरी के नाम से पुकारते हैं। बौद्धकाल में चंपा उत्तर भारत के महा जनपदों में एक थी। भगवान बुद्ध के मौदगल्य जैसे शिष्य तथा विशाखा जैसी शिष्या यहीं की धूली में लोटकर बड़े हुए। चक्रवर्ती सम्राट अशोक की मां सुभद्रांगी का जन्म यहीं इस चंपा के एक गरीब ब्राह्माण परिवार में हुआ था। चांद सौदागर के पुत्र बाला लखेन्द्र और पुत्रबधु महासती बिहुला की कथा इसी माटी की उपज है। आज भी चंपानगर विषहरी पूजा का केन्द्र स्थल है। यह इस अंगभूमि का दुर्भाग्य ही है कि इसकी गौरवशाली अतीत आज उपेक्षित होकर विस्मृति के गर्भ में समाता चला जा रहा है। डा. एसएम राफिक 'ज़मां' के अनुसार-'भागलपुर न केवल रूहानियत का शहर बल्कि अध्यात्म का नगर भी है। इसके चप्पे-चप्पे पर खुदा के नेक बंदे आराम फरमा रहे हैं, जिन्हें दुनिया सूफी, बुजुर्ग, औलिया ए किराम, दुर्वेश, फकीर, पीर इत्यादि नामों से पुकारती है। यही वे पवित्र हस्तियां हैं, जिन्होंने प्यार का पैगाम फैलाया। भागलपुर की खुशनसीबी है कि इसके लगभग सभी मुहल्लों में वलियों, दर्वेशों, फकीरों के आशियाने दिखाई देते हैं। भागलपुर की यह विशेषता है कि इसके अधिकतर मुहल्लों के नाम ऐसी ही पाक हस्तियों के नाम पर रखे गए हैं, जो आज से नहीं सदियों से सरकारी रिकार्ड में अंकित है।'
अंग्रेजी शासन काल में भागलपुर शोषण और दोहन के बाद के बाद भी विदेशी शासन के विरुद्ध लोहा लेता रहा।
Wednesday, October 28, 2009
जीते क्या व आंसू पीते हैं गरीब
ओवरलोडिंग पर नहीं चल रहा कानून का डंडा
Saturday, October 24, 2009
GI status sought for Bhagalpur silk fabrics and sarees
The Bhagalpur Regional Handloom Weavers Cooperative Union and six other organisations have filed an application before the Chennai-based Geographical Indication Registry, the competent authority under Government of India, for a GI tag for 'Bhagalpur Silk Fabrics and Sarees'.
The Geographical Indication is a sign used on goods that have a specific geographical origin and possess qualities, reputation or characteristics that are essentially attributable to that region.Once granted, the GI status would legally prohibit others to sell sarees and fabrics made at places other than Bhagalpur under the same brand.The GI tag for fabrics and sarees can become an effective tool for economic empowerment of the weaver community.The Bhagalpur Regional Handloom Weavers Cooperative Union and six other organisations have filed an application before the Chennai-based Geographical Indication Registry, the competent authority under Government of India, for a GI tag for 'Bhagalpur Silk Fabrics and Sarees'.
The Geographical Indication is a sign used on goods that have a specific geographical origin and possess qualities, reputation or characteristics that are essentially attributable to that region.Once granted, the GI status would legally prohibit others to sell sarees and fabrics made at places other than Bhagalpur under the same brand.The GI tag for fabrics and sarees can become an effective tool for economic empowerment of the weaver community.
Monday, October 12, 2009
US scientists to map Ganga stretch between Kahalgaon and Patna
The Inland Waterways Authority of India will lend support to the effort with a well equipped vessel to aid the research, between October 21 and 31.
जहां चलती थी रेलगाड़ी वहां अब चलती है बैलगाड़ी
Wednesday, May 13, 2009
क्या ऐसा होता माडल स्टेशन?
Wednesday, April 22, 2009
सैकड़ों एकड़ भूमि में कसाल उपजाने को विवश हैं किसान
Apr 22, 12:42 am
भागलपुर। वर्ष 1995 में आई बाढ़ की विभीषिका से प्रखंड के पूर्वी इलाके के गांवों के 5 सौ एकड़ खेतों में बालू भर जाने से किसान फसल के स्थान पर कसाल उपजाने को विवश हैं। कभी सब्जियों की अत्यधिक फसल उपजाने के लिए विख्यात अंगारी, सारथ, डंडाबाजर, छोटी दोस्तनी, बड़ी दोस्तनी, भड़ोखर आदि गांवों के खेत आज बंजर हो चुके हैं। एक समय यहां की सब्जियां बाहर भेजी जाती थी और किसानों के आय का मुख्य जरिया इसकी खेती होती थी। लेकिन अब यहां के किसान मन मारकर अपने बंजर खेतों में कसाल उपजाने को विवश हैं। आय का मुख्य साधन समाप्त हो जाने के कारण यहां के किसानों को रोजगार के लिए दूसरे शहरों में जाना पड़ रहा है। बीते वर्ष सरकार ने फसल मुआवजा व बालू हटाने के नाम पर किसानों को आर्थिक सहायता दी थी। लेकिन यह राशि कुछ ही किसानों को मिल पायी थी। जिसके कारण वह ऊंट के मुंह में जीरा साबित हुआ और आज भी गांवों के अधिकतर खेतों में बालू भरे पड़े हैं। किसानों ने कहा कि खेतों से बालू हटाने का कई बार प्रयास किया गया लेकिन वे उसमें सफल नहीं हो पाए तो थक-हार कर बैठ गए। विभागीय अधिकारियों से भी आरजू-मिन्नत की पर कोई लाभ नहीं हुआ। अंगारी गांव के किसान बद्री मंडल एवं आनंदी प्रसाद सिंह का कहना है कि यहां के किसान अब खेती के बजाय शहरों में जाकर मजदूरी करते हैं।
Monday, April 13, 2009
लतीफ़े
पति (पत्नी से)- बेवकूफ औरत, ऐसे मौकों पर तुम डरो मत मेरी तरह तुम भी चुपचाप आंखें बंद कर लिया करो।
संता (बंता से)- ओए बंता भाई एक बात बताओ, अगर नींद न आए तो क्या किया जाए?
बंता (संता से)- नींद का इंतजार करने से अच्छा है बंदा सो ही जाए।
मंजीत (डॉक्टर से)- डॉक्टर साहब, मुझे एक समस्या है।
डॉक्टर (मंजीत से)- क्या?
मंजीत- मुझे बात करते वक्त आदमी दिखाई नहीं देता।
डॉक्टर- ऐसा कब होता है?
मंजीत- जब-जब मैं फोन पर बात करता हूं।
Saturday, April 11, 2009
पानी से ही हो जाते हैं रोग छूमंतर (Apr 11,2009)
Apr 11, 12:24 am
भागलपुर। अभी तक आप लोगों ने बड़े-बड़े हाकिमों, वैद्यों और डाक्टरों के बारे में सुना या पढ़ा होगा, जो गंभीर से गंभीर रोग का उपचार करने में सक्षम होंगे। लेकिन यहां बात थोड़ी अलग है, हम ऐसे कुएं का जिक्र कर रहे हैं जिसके पानी के सेवन से कई रोग भी छूमंतर हो जाते हैं। गंगापार के नारायणपुर प्रखंड के नगरपाड़ा गांव स्थित इस कुएं के पानी के सेवन से गैस, घेघा सहित अन्य कई असाध्य बीमारियों का उपचार वर्षो से कई गांवों के लोग करते रहे हैं। लोग कुएं के पानी को चमत्कार मान इसकी बड़ी श्रद्धा से पूजा-अर्चना करते हैं। ग्रामीणों ने इसे कुओं का राजा व डाक्टर कुआं जैसे उपनाम भी दिए हैं। साढ़े चार सौ साल पुराने इस कुएं के अंदर एक प्लेट लगी हुई है, जिस पर कुएं के निर्माण से जुड़ी बातें लिखी हुई हैं। 1634 ई. में नगरपाड़ा के तत्कालीन राजा गोड़ नारायण सिंह ने इतने बड़े कुएं का निर्माण मुगलों के आक्रमण से गांव की हिफाजत के लिए किया था। 25 हाथ लंबे व इतना ही चौड़ा कुआं काफी गहरा है। ग्रामीण त्रिभुवन सिंह के अनुसार कुएं का पानी हर मौसम में बदलता रहता है। गांव में होने वाले किसी भी समारोह में ग्रामीण इसी कुएं का पानी उपयोग में लाते हैं। कुएं की ख्याति का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि देश के अन्य हिस्सों से लोग कुएं के पानी को लेने आते हैं। इसके साथ ही स्वस्थ होने पर कुएं की पूजा भी करते हैं। चुनाव के समय भी छोटे से बड़ा नेता गांव आता है तो वह कुएं पर जाकर अपनी मन्नत के लिए मत्था जरूर टेकता है।
Friday, April 10, 2009
Let's vote for the candidate who cares for Bhagalpur
So, why such situation should come? Let us resolute today to choose a better people out of the bad people contesting and give him a chance to develope out Bhagalpur. If the choosen leader is not able to perform out expectation, they may be shown the door in the next election.
So, Vote for Bhagalpur!
Thursday, April 9, 2009
बिजली के नाम पर छली गयी जनता
भागलपुर। पांच दिसम्बर 2004 को खगडि़या के वर्तमान सांसद डा. रवीन्द्र कुमार राणा की उपस्थिति में तत्कालीन ऊर्जा राज्यमंत्री श्याम रजक ने जब विद्युत सब स्टेशन का शिलान्यास किया तो लोगों को लगा कि हमारे सांसद बिजली की समस्या को अब दूर कर देंगे। शिलान्यास के समय ही लोगों को भरोसा दिलाया गया था कि दो साल में प्रखंड को बिजली मिलने लगेगी। परन्तु शिलान्यास के चार साल पूरा होने के बाद भी निर्माणाधीन सबस्टेशन से विद्युत आपूर्ति नहीं हो पायी है। विदित हो कि जब शिलान्यास किया जा रहा था उस समय विधान सभा चुनाव नजदीक था। फलस्वरूप वोट के लिए नेताओं ने लोगों को बिजली के नाम पर ठेंगा दिखा दिया। आज स्थिति यह है कि पूरा प्रखंड अंधेरे में डूबा रहता है। लोगों का लालटेन का ही सहारा है। प्रखंड वासी तो यहां तक कह रहे है कि जिस नेता ने अपने प्रखंड और गृह क्षेत्र को अच्छी सुविधा नहीं दे पाया वे अन्य क्षेत्रों में क्या सुविधा दे पाएंगे। बिजली के लिये ललायित प्रखंड वासी जेनरेटर पर अपना उद्योग व व्यवसाय चला रहे हैं। ज्ञातव्य हो कि पिछले बीस वर्षो से प्रखंड में बिजली की समस्या बनी है।
(source: www.in.jagran.yahoo.com